यह कैसा शिक्षक पुरस्कार : Madhya Pradesh Rajya Shikshak Puraskar

Madhya Pradesh Rajya Shikshak Puraskar : शिक्षक दिवस, जो एक गुरु के त्याग, समर्पण और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को नमन करने का दिन है, आज मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझकर रह गया है। पुरस्कार, जिसका मूल अर्थ ही बिना मांगे किसी की उत्कृष्ट उपलब्धियों का सार्वजनिक सम्मान करना होता है, उसे आज एक आवेदन पत्र की मोहताज प्रक्रिया बना दिया गया है।

स्वयं से पुरस्कार मांगने की विडंबना

किसी भी क्षेत्र में सच्चे कर्मयोगी को उसके काम और समाज में उसके प्रभाव के आधार पर पहचाना जाता है। किंतु, मध्य प्रदेश में शिक्षा विभाग ने एक ऐसी व्यवस्था लागू की है, जहाँ एक लिंक के माध्यम से शिक्षक को स्वयं अपनी उपलब्धियाँ दर्ज कर यह साबित करना पड़ता है कि वह पुरस्कार के योग्य है। एक गुरु से यह कहलवाना कि “मुझे पुरस्कार चाहिए”, उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने जैसा है। यह प्रक्रिया सम्मान कम और व्यवस्था की हठधर्मिता तथा अधिकारियों के अहम की संतुष्टि अधिक प्रतीत होती है।

मूल्यांकन का असंतुलित पैमाना

विभाग द्वारा तय की गई चयन प्रक्रिया का गणित अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। कुल 100 अंकों की इस मूल्यांकन प्रणाली में:

  • मात्र 15 अंक शिक्षक की वास्तविक उपलब्धि, 90% उपस्थिति और 100% परीक्षा परिणाम के लिए रखे गए हैं।
  • हैरानी की बात यह है कि ये बुनियादी आंकड़े भी विभाग के पास पारदर्शी रूप से होने के बजाय, शिक्षक को स्वयं सिद्ध करने पड़ते हैं।
  • चयन का पूरा दारोमदार शेष 75 अंकों पर टिका है, जो पूरी तरह से एक साक्षात्कार पर निर्भर करता है।

साक्षात्कारकर्ताओं की शैक्षिक समझ पर प्रश्नचिह्न

इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास वे अधिकारी हैं जो यह 75 अंकों का साक्षात्कार लेते हैं। शिक्षाशास्त्र एक गहरा विज्ञान है। जो अधिकारी मनोविज्ञान के स्तंभों—जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास, लेव वाइगोत्स्की के सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत या थार्नडाइक के सीखने के नियमों को नहीं समझते, वे एक शिक्षक की शिक्षण विधियों का मूल्यांकन कैसे कर सकते हैं? जिन्हें कक्षा के यथार्थ, बाल मनोविज्ञान और शिक्षा की जमीनी हकीकत का कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं है, वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह तय कर रहे हैं कि कौन सा शिक्षक सर्वश्रेष्ठ है।

यह कैसी विडंबना है कि एक प्रशासनिक अधिकारी, जो शिक्षा की बुनियादी बारीकियों से अनभिज्ञ हो सकता है, एक अनुभवी शिक्षक की योग्यता का प्रमाण पत्र बांट रहा है? वास्तव में, वर्तमान स्वरूप में यह शिक्षकों का सम्मान नहीं, बल्कि व्यवस्थागत खामियों का एक स्पष्ट उदाहरण है।

क्या आपको लगता है कि शिक्षकों के मूल्यांकन के लिए इन प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय अनुभवी और सेवानिवृत्त शिक्षाविदों की एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाना चाहिए?

Leave a Comment