Teacher is Multi Tasking Machine : क्या शिक्षा विभाग ने शिक्षकों को ‘Multi Tasking Machine’ समझ लिया है?

Teacher is Multi Tasking Machine : यह अब भविष्य की किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का विषय नहीं रह गया है, बल्कि आज के सरकारी शिक्षा तंत्र की सबसे कड़वी सच्चाई बन चुका है। वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा लगता है जैसे शिक्षा विभाग और नीतियां बनाने वाले ब्यूरोक्रेट्स ने यह मान लिया है कि सरकारी स्कूलों में इंसान नहीं, बल्कि ‘Multi Tasking Machine-रोबोट’ काम कर रहे हैं। एक ऐसा रोबोट जिसमें भावनाएं या थकान नहीं होती, जिसकी बैटरी कभी खत्म नहीं होती, और जिसे एक साथ 10 कमांड देकर बैकग्राउंड में प्रोसेस कराया जा सकता है।

मूल रूप से एक शिक्षक का काम क्या होता है? कक्षा में जाना, बच्चों का भविष्य गढ़ना और उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज का शिक्षक शिक्षा के अलावा दुनिया भर के वो तमाम काम कर रहा है, जो असल में एक डेटा एंट्री ऑपरेटर, क्लर्क, या इवेंट मैनेजर के होते हैं। आइए, इस “Multi Tasking Machine” सिस्टम का एक क्रिटिकल विश्लेषण करते हैं।

🤖 एक ‘रोबोट’ शिक्षक की दैनिक दिनचर्या (The Endless Loop of Non-Academic Work)

शिक्षा विभाग की नजर में एक आदर्श शिक्षक वह नहीं है जो शानदार तरीके से गणित या विज्ञान पढ़ाता हो, बल्कि वह है जो नीचे दिए गए सभी गैर-शैक्षणिक कार्यों (Non-Academic Work) को बिना सवाल किए एक मशीन की तरह पूरा कर सके:

  • E-Attendance का खौफ: सुबह स्कूल पहुँचते ही सबसे पहला संघर्ष सर्वर और नेटवर्क से होता है। लोकेशन ट्रेसिंग और ई-अटेंडेंस (E-attendance) के चक्कर में शिक्षक का पहला एक घंटा मोबाइल स्क्रीन को घूरते हुए कट जाता है।
  • UDISE और डेटा फीडिंग: स्कूलों का भारी-भरकम UDISE डेटा फीड करना एक ऐसा काम है जो कभी खत्म नहीं होता। कंप्यूटर पर बैठकर स्कूल के कमरों के साइज से लेकर डेस्क की संख्या तक का डेटा शिक्षक ही अपडेट करते हैं।
  • APAAR ID और आधार वेरिफिकेशन: अब नया सिरदर्द है छात्रों की APAAR ID जनरेट करना। बच्चों के आधार कार्ड मंगवाना, उनके नाम की स्पेलिंग सुधारना और पोर्टल पर केवाईसी (KYC) करना—यह सब एक क्लर्क का काम है, जो शिक्षक के माथे मढ़ दिया गया है।
  • Scholarship (छात्रवृत्ति) के फॉर्म: बच्चों के बैंक खाते खुलवाना, उनकी समग्र आईडी लिंक कराना और स्कॉलरशिप के फॉर्म ऑनलाइन सबमिट करना। अगर एक भी बच्चे की छात्रवृत्ति रुकी, तो गाज सीधे शिक्षक पर गिरती है।
  • Daily Reports (दैनिक रिपोर्टिंग): आज कितने बच्चे आए? मध्याह्न भोजन (Mid-day Meal) में क्या बना? कितनों ने खाया? इस सबकी डेली रिपोर्ट वॉट्सऐप ग्रुप्स और दर्जनों अलग-अलग पोर्टल्स पर शाम तक भेजना अनिवार्य है।

🎪 Politically Affected Events: स्कूलों का राजनीतिकरण और इवेंट मैनेजमेंट

जैसे ही डेटा फीडिंग के काम से थोड़ी फुर्सत मिलती है, सिस्टम एक नया टास्क दे देता है। स्कूलों में होने वाले आयोजनों (Events) पर राजनीति इस कदर हावी है (Politically affected events in schools) कि शिक्षक अब एक इवेंट मैनेजर बनकर रह गया है।

किसी भी सरकारी योजना का शुभारंभ हो, नेताओं का दौरा हो, या कोई रैली हो—भीड़ जुटाने का जिम्मा शिक्षकों का है। टेंट की व्यवस्था, बच्चों को लाइन में खड़ा करना, बैनर-पोस्टर लगाना और नेताओं के स्वागत के लिए तालियां बजवाना। क्या शिक्षा विभाग को लगता है कि शिक्षक की नियुक्ति इन राजनीतिक आयोजनों को सफल बनाने के लिए हुई है?

💥 Board Exam 2027 vs Census 2027: ब्यूरोक्रेसी का ‘अल्टीमेट क्रैश टेस्ट’

अगर आपको लगता है कि उपरोक्त काम काफी हैं, तो जरा फरवरी 2027 के महा-संकट पर गौर कीजिए। जैसा कि सर्वविदित है, 24 फरवरी 2027 से 10वीं और 17 फरवरी से 12वीं की वार्षिक परीक्षाएं (Annual Exam 2027) शुरू हो रही हैं। इसी बीच, सरकार ने राष्ट्रीय जनगणना 2027 (National Census 2027) के दूसरे चरण का कट-ऑफ 28 फरवरी तय कर दिया है।

  • क्या इंसान यह कर सकता है? एक तरफ शिक्षक को सुबह 8 बजे परीक्षा केंद्र में ड्यूटी देनी है, बोर्ड परीक्षाओं की कॉपियों और प्रश्न-पत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, और दूसरी तरफ उसी शिक्षक को दोपहर में वार्डों में जाकर जनगणना का रजिस्टर भरना है।
  • Teacher Vs Robot का सटीक उदाहरण: ब्यूरोक्रेट्स का यह आदेश साफ दर्शाता है कि वे शिक्षकों को मशीन मानते हैं। केवल एक रोबोट ही सुबह बोर्ड परीक्षा में ड्यूटी (Anti-copying algorithms) चला सकता है और दोपहर में घर-घर जाकर जनगणना (Data Collection algorithm) कर सकता है। एक हाड़-मांस का इंसान यह मानसिक और शारीरिक तनाव कैसे झेलेगा, यह सोचने की फुर्सत किसी अधिकारी के पास नहीं है।

📉 ‘Quality Education’ का मजाक

जब एक शिक्षक अपनी ऊर्जा का 80% हिस्सा UDISE, APAAR ID, Scholarship, E-attendance, Daily reports, और चुनाव/जनगणना जैसे कार्यों में लगा देगा, तो वह कक्षा में क्या पढ़ाएगा?

सरकारें मंच से चिल्ला-चिल्ला कर “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” (Quality Education) और “स्मार्ट क्लास” की बातें करती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने शिक्षकों को “स्मार्ट क्लर्क” बना दिया है। जब रिजल्ट खराब आता है, तो सारा ठीकरा उसी शिक्षक के सिर फोड़ दिया जाता है जिसे साल भर पढ़ाने का वक्त ही नहीं दिया गया।

निष्कर्ष: सिस्टम को Reboot करने की जरूरत है

Multi Tasking Machine की इस अघोषित लड़ाई में शिक्षक हार रहा है और शिक्षा का स्तर गर्त में जा रहा है। शिक्षा विभाग को यह समझना होगा कि शिक्षक राष्ट्र का निर्माता है, कोई रोबोटिक डेटा-एंट्री ऑपरेटर नहीं।

यदि सरकार वास्तव में शिक्षा के स्तर में सुधार चाहती है, तो गैर-शैक्षणिक और क्लर्कियल कामों (Non-academic work) के लिए अलग से स्टाफ नियुक्त करना होगा। बोर्ड परीक्षाओं और जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्यों के बीच तालमेल बिठाने के लिए प्रशासनिक समझदारी (Administrative sensibility) दिखानी होगी। जब तक शिक्षक को केवल ‘शिक्षण’ का कार्य नहीं सौंपा जाएगा, तब तक शिक्षा व्यवस्था की सूरत बदलना नामुमकिन है।

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