Downfall Indian Education system : सरकारी स्कूलों का पतन, प्रशासनिक बोझ और टूटता हुआ भविष्य

Downfall Indian Education system : भारतीय शिक्षा प्रणाली आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहाँ एक ओर हम ‘विश्व गुरु’ बनने के सपने देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन सपनों के विपरीत दिशा में जा रही है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की नींव में आई दरारों को उजागर कर दिया है। पिछले 10 वर्षों में लगभग 94,000 सरकारी स्कूलों का बंद होना महज सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी है। यह लेख उन कारणों, प्रशासनिक विफलताओं और व्यवस्थागत चुनौतियों का विश्लेषण करता है जिन्होंने हमारी शिक्षा प्रणाली को गहरे संकट में धकेल दिया है।

1. सांख्यिकीय त्रासदी: 94,000 स्कूलों का गुमनाम अंत

नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 2014 में देश में 11.7 लाख सरकारी स्कूल थे, जो 2024-25 तक घटकर 10.3 लाख रह गए। प्रतिदिन औसतन 25 स्कूलों का बंद होना यह साबित करता है कि हम शिक्षा के विस्तार के बजाय उसके संकुचन की नीति पर चल रहे हैं।

  • विलय बनाम बंदी: सरकार का तर्क है कि ‘स्कूल एकीकरण’ (Merger) का उद्देश्य गुणवत्ता सुधारना है। लेकिन जब एक स्कूल बंद होता है, तो उसका सीधा असर वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। दूरी बढ़ने के कारण बच्चों का ड्रॉप-आउट दर बढ़ जाता है।
  • निजीकरण का बढ़ता प्रभाव: सरकारी स्कूल घट रहे हैं, लेकिन निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख तक पहुंच गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए शिक्षा तक पहुंच एक विलासिता बनती जा रही है।

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2. प्रशासनिक बोझ: जब शिक्षक ‘डेटा ऑपरेटर’ बनकर रह गए

एक शिक्षक का प्राथमिक कार्य ‘शिक्षण’ है, लेकिन आज के भारतीय सरकारी शिक्षक की दिनचर्या फाइलों और पोर्टल के इर्द-गिर्द घूमती है।

  • डिजिटल गुलामी: अपार आईडी (APAAR ID), यू-डायस (UDISE), बोर्ड नामांकन, और साइकिल/किताब वितरण जैसे कार्यों के लिए शिक्षकों को घंटों ऑनलाइन काम करना पड़ता है।
  • गैर-शैक्षणिक कार्यों का मकड़जाल: जनगणना, चुनाव ड्यूटी, बीआरसी (BRC), बीएसी (BAC) और सीएसी (CAC) के कार्यों में शिक्षकों की व्यस्तता ने कक्षाओं को ‘खाली’ कर दिया है।
  • योजनाओं का प्रबंधन: मिड-डे मील की गुणवत्ता, एम-पीटास (MPTAAS) और छात्रवृत्ति के लिए ओ-टी-आर (OTR) का प्रबंधन अब शिक्षक की मुख्य जिम्मेदारी बन गया है। इस कागजी बोझ के कारण छात्र-शिक्षक संवाद लगभग समाप्त हो चुका है।

3. ड्रॉप-आउट का बढ़ता ग्राफ: शिक्षा से मोहभंग

शिक्षा प्रणाली में ड्रॉप-आउट की दर चिंताजनक है। रिपोर्ट के अनुसार:

  • प्राथमिक स्तर पर 3%, उच्च प्राथमिक पर 3.5% और माध्यमिक स्तर पर यह 11.5% तक पहुंच जाती है।
  • नामांकन दर में गिरावट (91.58% से घटकर 86.6%) यह दर्शाती है कि स्कूल अब बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत नहीं रहे। विशेष रूप से बिहार, मध्य प्रदेश, मेघालय और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह गिरावट शिक्षा व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।

4. प्रश्न-पत्र लीक: मेधा और विश्वास की हत्या

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं के पेपर लीक की घटनाओं ने युवा पीढ़ी के विश्वास को पूरी तरह तोड़ दिया है।

  • भ्रष्टाचार की जड़ें: यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार का परिणाम है। जब एक होनहार छात्र वर्षों की मेहनत के बाद पेपर लीक की खबर सुनता है, तो उसका मनोबल टूट जाता है।
  • व्यवस्थागत विफलता: पेपर लीक का सीधा संबंध शिक्षा विभाग की लचर सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक संरक्षण से है। यह शिक्षा के ‘प्रतिस्पर्धात्मक’ ढांचे पर एक करारा प्रहार है।

5. स्कूलों का ‘राजनीतिकरण’ और सामाजिक दबाव

आज के दौर में स्कूलों को केवल सीखने का केंद्र नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के प्रचार का मंच बना दिया गया है।

  • ‘एक पेड़ मां के नाम’, ‘जल जीवन मिशन’ या अन्य राजनीतिक कार्यक्रम स्कूलों पर थोपे जाते हैं। शिक्षकों को इन कार्यक्रमों के आयोजन, फोटोग्राफी और रिपोर्टिंग के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे शैक्षणिक समय की बर्बादी होती है। स्कूल एक शिक्षण संस्थान के बजाय ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की जगह बन गए हैं।

6. बुनियादी ढांचे की कमी: एक उपेक्षित वास्तविकता

आजादी के 79 साल बाद भी कई सरकारी स्कूलों में बिजली, स्वच्छ पेयजल और खेल के मैदानों का अभाव है। जब बुनियादी ढांचे की कमी होती है, तो अभिभावक का विश्वास सरकारी प्रणाली से उठ जाता है। यह उपेक्षा सीधे तौर पर उन बच्चों के भविष्य को प्रभावित करती है जो निजी स्कूलों का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।

7. उच्च कार्यालयों की डेटा-केंद्रित प्राथमिकताएं

बैठकों में 90% समय केवल डेटा की समीक्षा, पोर्टल की एंट्री और रिपोर्ट के अनुपालन में व्यतीत होता है। शैक्षणिक गुणवत्ता और बच्चों की सीखने की क्षमताओं पर चर्चा करना हाशिए पर चला गया है। उच्च अधिकारी जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ, केवल कागजी आंकड़ों को सुधारने पर जोर देते हैं।

8. शिक्षकों का अभाव और कानूनी हस्तक्षेप: व्यवस्था की विफलता का प्रमाण

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का संकट अब अदालती गलियारों तक पहुँच गया है। हाल ही में मध्य प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के भारी अभाव को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2025 की कैग (CAG) रिपोर्ट का हवाला देते हुए खुलासा किया है कि प्रदेश के 1,895 सरकारी स्कूलों में एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है। यह स्थिति न केवल शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि लाखों बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है।

कैग की रिपोर्ट में यह भी चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि 7,000 करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक बजट होने के बावजूद, हजारों स्कूल शिक्षकों के बिना चल रहे हैं। इस प्रशासनिक और वित्तीय कुप्रबंधन का सीधा असर छात्रों के शैक्षणिक परिणामों पर पड़ा है। याचिका के अनुसार, हाईस्कूल का उत्तीर्ण प्रतिशत जो 2018-19 में 67.74% था, वह 2021-22 में गिरकर मात्र 38.53% रह गया है। हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार और शिक्षा विभाग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि कागजी योजनाओं और वास्तविक धरातल के बीच कितना गहरा अंतर है, और जवाबदेही का अभाव किस प्रकार शिक्षा की गुणवत्ता को रसातल में ले जा रहा है।

समाधान की दिशा: क्या किया जाना चाहिए?

सरकारी शिक्षा को बचाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने अनिवार्य हैं:

  1. लिपिकीय स्टाफ (Clerical Staff) की नियुक्ति: शिक्षकों को शिक्षण के अलावा अन्य सभी प्रशासनिक कार्यों से मुक्त किया जाना चाहिए। स्कूलों में अलग से प्रशासनिक कर्मचारी नियुक्त किए जाएं ताकि शिक्षक अपनी ऊर्जा अध्यापन में लगा सकें।
  2. विलय नीति पर पुनर्विचार: भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्कूलों को बंद करने के बजाय, वहां शिक्षकों की कमी को पूरा किया जाए।
  3. पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून: परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी संस्था का गठन हो, जिसमें दोषियों के लिए सख्त दंड का प्रावधान हो।
  4. राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक: स्कूलों को राजनीतिक आयोजनों से पूरी तरह मुक्त रखा जाए ताकि वहां का वातावरण विशुद्ध रूप से शैक्षणिक बना रहे।
  5. गुणवत्ता आधारित मूल्यांकन: डेटा एंट्री के बजाय, छात्रों के सीखने के परिणामों (Learning Outcomes) को शिक्षा की सफलता का मापदंड माना जाए।

निष्कर्ष

94,000 सरकारी स्कूलों का बंद होना और पेपर लीक की निरंतर घटनाएं एक खतरनाक भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं। यदि हमने अभी अपनी प्राथमिकताओं को नहीं बदला, तो शिक्षा व्यवस्था केवल एक कागजी ढांचा बनकर रह जाएगी। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है; यदि रीढ़ ही कमजोर होगी, तो प्रगति का सपना अधूरा ही रहेगा। अब समय आ गया है कि हम ‘फाइलों के बोझ’ को हटाकर वापस ‘बच्चों की कक्षा’ की ओर लौटें।

क्या आपको लगता है कि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन के लिए शिक्षकों को पूरी तरह से ‘गैर-शैक्षणिक’ कार्यों से अलग करना, किसी भी अन्य सुधार से अधिक प्रभावी साबित होगा?

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