Democratic New Single Window System : जानें लोकतंत्र का नया सिंगल-विंडो सिस्टम (Democratic New Single Window System) , जहां नागरिकों के संवाद की जगह खाकी वर्दी और पुलिस बैरिकेड्स ले रहे हैं। प्रशासनिक संवादहीनता और वर्तमान परिदृश्य पर विशेष लेख।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल अवधारणा परस्पर संवाद, जवाबदेही और अधिकारों के सम्मान पर टिकी होती है। नागरिक और राज्य के बीच एक सीधा, पारदर्शी और सहज संवाद तंत्र होना किसी भी स्वस्थ गणराज्य की पहली शर्त मानी जाती है। किंतु आज के दौर में जब हम देश के विभिन्न कोनों से उठती आवाजों को देखते हैं—चाहे वह सीमाओं पर बैठे किसान हों, सड़कों पर न्याय की गुहार लगाते पदक विजेता खिलाड़ी हों, रोजगार और भर्ती परीक्षाओं के पर्चे लीक होने से आक्रोशित युवा (जेन-जी और जेन-अल्फा) हों, या पुरानी पेंशन व कार्यदशाओं को लेकर लामबंद सरकारी कर्मचारी—एक विचित्र और चिंताजनक प्रतिमान स्पष्ट रूप से उभरता है।
मांग चाहे नीतिगत बदलाव की हो, न्याय की हो या केवल अपनी पीड़ा सुनाने की, नागरिकों और संबंधित नीति-निर्माताओं के बीच सीधे संवाद का पुल गायब हो चुका है। उसकी जगह खड़ी हो जाती है वाटर कैनन, बैरिकेड्स, धारा 144 और पुलिस की बहुस्तरीय सुरक्षा दीवार।
‘वन-वे ट्रैफिक’ बनता प्रशासनिक तंत्र
आधुनिक शासन व्यवस्था में अधिकारों और कर्तव्यों का संतुलन पूरी तरह एकतरफा नजर आने लगा है। जब शासन या उच्चाधिकारियों को कोई नया नियम लागू करना होता है, कार्य का दायरा बढ़ाना होता है, वेतन ढांचे में बदलाव करना होता है या नीतियां थोपनी होती हैं, तो संवाद ‘सुपरफास्ट’ गति से नीचे की ओर प्रवाहित होता है। बिना किसी पूर्व परामर्श के आदेश सीधे संबंधित कर्मचारियों, किसानों, छात्रों या नागरिकों पर तामील कर दिए जाते हैं। वहां कोई मध्यस्थ नहीं होता, कोई सुरक्षा घेरा नहीं होता; केवल प्रशासनिक फरमान होता है जिसका पालन अनिवार्य माना जाता है।
इसके ठीक उलट, जब वही प्रभावित वर्ग—वही किसान जिनके श्रम पर देश की खाद्य सुरक्षा टिकी है, वही खिलाड़ी जिन्होंने देश का मान बढ़ाया, या वही कर्मचारी जो दिन-रात प्रशासनिक पहिया घुमाते हैं—अपनी वाजिब समस्याओं, आपत्तियों या अधिकारों को लेकर आला अधिकारियों और नीति-निर्माताओं से मिलने का प्रयास करते हैं, तो प्रशासनिक खिड़कियां अचानक बंद हो जाती हैं। वहां न कोई संयुक्त सचिव मिलता है, न संबंधित मंत्री, और न ही कोई नीतिगत प्रतिनिधिमंडल। वहां सामने आकर खड़ी हो जाती है खाकी वर्दी।
यह प्रशासनिक व्यवस्था का वह ‘वन-वे ट्रैफिक’ है, जहां सत्ता ऊपर से नीचे सीधे आदेश तो दे सकती है, लेकिन नीचे से ऊपर उठने वाले किसी भी निवेदन, ज्ञापन या गुहार को सुनने के लिए तैयार नहीं है।
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| Democratic New Single Window System के नाम पर आज हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक अजीब सा बदलाव देखने को मिल रहा है। इस नए Democratic New Single Window System के तहत नागरिकों और सरकार के बीच होने वाला सीधा संवाद पूरी तरह गायब हो चुका है। पारंपरिक मंत्रालयों और विभागों के दरवाजे बंद हो चुके हैं, और हर समस्या के समाधान के रूप में केवल पुलिस बैरिकेड्स, धारा 144 और आंसू गैस के गोले ही बच गए हैं। यह Single Window System वस्तुतः प्रशासन का एकतरफा मार्ग बन गया है, जहां ऊपर से आदेश तो आसानी से नीचे आ जाते हैं, लेकिन जनता की आवाज ऊपर तक नहीं पहुंच पाती। चाहे किसान हों, युवा हों या सरकारी कर्मचारी, अपनी हर मांग के लिए उन्हें अब सीधे तौर पर पुलिस और सुरक्षा बलों का सामना करना पड़ता है। एक स्वस्थ गणराज्य में जहां संवाद और जवाबदेही प्राथमिक होनी चाहिए, वहां इस Single Window System ने पुलिस को ही देश का एकमात्र ‘कस्टमर केयर’ और संकटमोचक बना दिया है। यदि इस Democratic New Single Window System के इस विडंबनापूर्ण चलन को जल्द नहीं बदला गया, तो जनता और प्रशासन के बीच का यह सामाजिक अनुबंध हमेशा के लिए टूट जाएगा। |
पुलिस: लोकतंत्र का नया ‘कस्टमर केयर’
इस वर्तमान परिदृश्य ने एक अत्यंत विद्रूप और हास्यास्पद स्थिति पैदा कर दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि शासन ने अपनी सभी प्रशासनिक, अकादमिक, कृषि, खेल और श्रम संबंधी जिम्मेदारियों को आउटसोर्स करके गृह विभाग और स्थानीय पुलिस थानों के हवाले कर दिया है:
- कृषि मंत्रालय की जगह पुलिस बैरिकेड: किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बात करनी हो, तो वे कृषि भवन जाने के बजाय बॉर्डर पर पुलिस के आला अधिकारियों से बात करते दिखते हैं।
- खेल मंत्रालय की जगह लाठी और डिटेंशन: गंभीर मामलों में जब खिलाड़ी न्याय मांगते हैं, तो उनकी सुनवाई खेल प्राधिकरण या संबंधित मंत्रालय में होने के बजाय धरने और प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस के घेरे में होती दिखती है।
- शिक्षा विभाग की जगह धारा 144: जब छात्र पेपर लीक, अनिश्चित परीक्षा परिणामों या फीस वृद्धि के विरोध में आते हैं, तो शिक्षा मंत्री या आयोग के अध्यक्ष के स्थान पर पुलिस अधिकारी उन्हें समझाते या खदेड़ते नजर आते हैं।
- श्रम विभाग की जगह आंसू गैस के गोले: कार्यस्थल की सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी की मांग करने वाले कामगारों का पहला और अंतिम वास्ता केवल पुलिस से पड़ता है।
जब हर विभाग का संकटमोचक, मध्यस्थ और प्रवक्ता केवल पुलिस ही बन चुका है, तो स्वाभाविक रूप से यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है: क्या अब नागरिकों, छात्रों, किसानों और कर्मचारियों को संबंधित मंत्रालयों और विभागों के पते अपनी डायरी से काट देने चाहिए? क्या अब सभी मांगें, ज्ञापन, इस्तीफे, परिवेदनाएं और प्रोजेक्ट रिपोर्ट सीधे नजदीकी पुलिस थाने में दर्ज करानी चाहिए?
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सीधे ‘थानेदार’ को ही क्यों न बनाया जाए अंतिम प्राधिकारी?
यदि प्रशासन ने यह तय ही कर लिया है कि वह जनता की कोई भी मांग बिना पुलिस हस्तक्षेप के नहीं सुनेगा, तो फिर व्यवस्था का सरलीकरण क्यों न कर दिया जाए?
- छात्रों के लिए: छात्रों को अपनी परीक्षा की उत्तरपुस्तिका की री-चेकिंग करानी हो, तो वे विश्वविद्यालय के कुलपति के पास जाने का समय व्यर्थ करने के बजाय सीधे एसएचओ के पास संपर्क करें।
- किसानों के लिए: किसानों को खाद, बीज या फसल के वाजिब दाम तय कराने हों, तो वे कृषि वैज्ञानिकों या नीति आयोग के बजाय पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करें।
- कर्मचारियों के लिए: कर्मचारियों को अगर महंगाई भत्ता या पेंशन की मांग रखनी हो, तो वे विभाग के निदेशक को ज्ञापन देने के बजाय ट्रैफिक अधिकारियों को अर्जी सौंपें कि अगली बार जब वे सड़क पर आएं, तो सीधे उसी अधिकारी से बातचीत की जा सके जो उन्हें हिरासत में लेने आने वाला है।
यह व्यंग्य वास्तविकता के उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसमें संस्थागत संवाद पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। जब नीति-निर्माता जनता के सामने आने का साहस खो बैठते हैं, तो वे कानून-व्यवस्था की आड़ लेकर पुलिस को ढाल बना लेते हैं। पुलिस, जिसका मूल कार्य अपराध नियंत्रण और विधि का शासन बनाए रखना है, आज नीतिगत विफलताओं और प्रशासनिक हठधर्मिता की कीमत अपनी साख गंवाकर चुका रही है।
संवादहीनता और लोकतांत्रिक क्षरण का जोखिम
किसी भी समाज में जब शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रतिरोध को केवल एक ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की समस्या मान लिया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक परिपक्वता के क्षरण का स्पष्ट संकेत है। प्रतिरोध कोई अपराध नहीं है; यह नीतियों के संशोधन का सबसे जीवंत तंत्र है।
जब सत्ता अपने ही नागरिकों, अपने ही कर्मचारियों और अपने ही देश के भविष्य से डरने लगे और हर असहमति के सामने हथियारबंद सुरक्षा तंत्र खड़ा करने लगे, तो सत्ता और नागरिक के बीच का सामाजिक अनुबंध टूटने लगता है। इससे न केवल नागरिकों का व्यवस्था से विश्वास उठता है, बल्कि प्रशासनिक ढांचा भी संवेदनहीन और तानाशाही की ओर झुकने लगता है।
समाधान: वर्दी को ढाल बनाना बंद करना होगा
प्रशासन को यह समझना होगा कि जनआक्रोश को पुलिस के लाठीचार्ज या वॉटर कैनन से दबाया तो जा सकता है, लेकिन सुलझाया नहीं जा सकता। नीतियों में संशोधन पुलिस डायरी से नहीं, बल्कि संसद, मंत्रालयों और संवाद की मेजों से ही संभव है।
यदि लोकतंत्र को केवल ‘आदेश देने वाले आका’ और ‘आदेश मानने वाली जनता’ के एकतरफा मॉडल से बचाना है, तो संबंधित अधिकारियों को अपनी वातानुकूलित सुरक्षा परिधि से बाहर निकलना होगा। उन्हें समझना होगा कि पुलिस सुरक्षा का साधन है, प्रशासनिक संवादहीनता को छिपाने का पर्दा नहीं। जब तक जनता की मांगों को सुनने के लिए विभाग खुद अपनी खिड़कियां नहीं खोलेंगे, तब तक यही विडंबना कायम रहेगी कि देश की हर समस्या का ‘नोडल अधिकारी’ केवल और केवल पुलिस ही बनकर रह जाएगी।