भारतीय शिक्षा प्रणाली का पतन: An Institutional Exam Leak Not Only Paper Leak मध्य प्रदेश के विशेष संदर्भ में

An Institutional Exam Leak Not Only Paper Leak : किसी भी देश के विकास की रीढ़ उसकी शिक्षा प्रणाली होती है। लेकिन जब शिक्षा व्यवस्था ज्ञान के निर्माण के बजाय केवल आंकड़े सुधारने और कागजी डिग्रियां बांटने की फैक्ट्री बन जाए, तो परिणाम विनाशकारी होते हैं। आज भारतीय शिक्षा प्रणाली, विशेषकर मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, गंभीर संरचनात्मक पतन के दौर से गुजर रही है। हम अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं के ‘पेपर लीक’ होने का रोना रोते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारी पूरी ‘परीक्षा प्रणाली ही लीक’ (Pariksha Leak) हो चुकी है।

लगातार बदलते नियम, राजनीतिक फायदे के लिए छात्रों को बिना योग्यता के पास करने की होड़ और शिक्षा के गिरते स्तर ने एक ऐसी पीढ़ी को जन्म दिया है जिसे हम ‘पढ़ा-लिखा अनपढ़’ कह सकते हैं। आइए, पिछले कुछ वर्षों में लागू की गई उन चार प्रमुख नीतियों का विश्लेषण करें जिन्होंने शिक्षा की नींव को खोखला कर दिया है।

1. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE 2009) और ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ (8वीं तक किसी को फेल न करना)

भारतीय शिक्षा प्रणाली में गिरावट का सबसे बड़ा और पहला ढांचागत कारण ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009’ के तहत लागू की गई ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ (No Detention Policy) थी। इस नीति के तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि कक्षा 8 तक किसी भी छात्र को फेल नहीं किया जाएगा।

उद्देश्य बनाम यथार्थ:
इस नीति को लागू करते समय तर्क दिया गया था कि इससे बच्चों पर परीक्षा का दबाव कम होगा और स्कूल ड्रॉपआउट (बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले) की संख्या में कमी आएगी। लेकिन व्यवहारिक धरातल पर इसका परिणाम बेहद भयानक रहा। जब छात्रों के मन से फेल होने का डर पूरी तरह खत्म हो गया, तो उनके भीतर से सीखने की ललक भी मर गई। दूसरी ओर, शिक्षकों ने भी जवाबदेही से हाथ खींच लिए क्योंकि उन्हें पता था कि बच्चा पढ़े या न पढ़े, उसे अगली कक्षा में प्रमोट कर ही दिया जाएगा।

परिणाम:
वर्षों तक इस नीति के लागू रहने के कारण लाखों छात्र कक्षा 9 में ऐसे पहुंचे जिन्हें ठीक से हिंदी पढ़ना, अंग्रेजी के बुनियादी शब्द लिखना या गणित के सामान्य जोड़-घटाव तक नहीं आते थे। जब प्रथम संस्था की ‘असर’ (ASER) जैसी शिक्षा रिपोर्टों में इस खोखलेपन का खुलासा हुआ और शिक्षाविदों ने कड़ी आलोचना की, तब जाकर सरकार जागी। भारी आलोचना के बाद अंततः इस नीति को वापस लिया गया और कक्षा 5वीं व 8वीं में फिर से बोर्ड परीक्षा/मूल्यांकन व्यवस्था लागू की गई। लेकिन तब तक एक पूरी पीढ़ी की शैक्षणिक नींव बर्बाद हो चुकी थी।

2. ‘बेस्ट ऑफ फाइव’ (Best of Five) योजना का भ्रम और पतन

‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ के कारण जो बिना नींव वाले छात्र कक्षा 9 और 10 में पहुंचे, वे बोर्ड परीक्षाओं में बुरी तरह फेल होने लगे। मध्य प्रदेश बोर्ड का पासिंग प्रतिशत अचानक धड़ाम से नीचे गिर गया। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के बजाय, सरकार ने पासिंग प्रतिशत के आंकड़ों को कॉस्मेटिक तरीके से सुधारने का शॉर्टकट निकाला—‘बेस्ट ऑफ फाइव’ (Best of Five) योजना

नीति क्या थी?
कक्षा 10वीं में कुल 6 मुख्य विषय होते हैं। ‘बेस्ट ऑफ फाइव’ नियम के तहत यह प्रावधान किया गया कि यदि कोई छात्र किन्हीं 5 विषयों में पास हो जाता है और एक विषय में फेल भी हो जाता है, तो भी उसे ‘पास’ घोषित कर दिया जाएगा।

विनाशकारी प्रभाव:
इस योजना ने छात्रों की मानसिकता पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला। छात्रों ने कठिन विषयों (मुख्य रूप से गणित और अंग्रेजी) को पढ़ना ही छोड़ दिया। उन्हें पता था कि वे बाकी 5 सरल विषयों में पास होकर 10वीं की मार्कशीट हासिल कर लेंगे। नतीजा यह हुआ कि मध्य प्रदेश में ऐसे लाखों छात्र 10वीं पास कर गए जिन्हें गणित के सामान्य सूत्र या अंग्रेजी का बुनियादी ज्ञान नहीं था। बिना गणित और अंग्रेजी के आज के प्रतियोगी युग में छात्र का भविष्य अंधकारमय हो जाता है।

लंबे समय तक इस नीति की कड़ी आलोचना होने के बाद, अंततः मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग को अपनी गलती का अहसास हुआ है और सत्र 2025-26 (कक्षा 9) तथा 2026-27 (कक्षा 10) से इस योजना को पूरी तरह समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जो छात्र इस योजना की बैसाखी के सहारे पास हुए हैं, वे आज रोजगार के बाजार में संघर्ष कर रहे हैं।

3. कठिन विषयों का सरलीकरण: ‘बेसिक’ (Basic) और ‘स्टैंडर्ड’ (Standard) का खेल

‘बेस्ट ऑफ फाइव’ की तरह ही एक और नीतिगत बदलाव जिसने शिक्षा के स्तर को गिराया, वह था मुख्य विषयों का सरलीकरण। सीबीएसई की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी अंग्रेजी और विशेषकर गणित जैसे विषयों को दो स्तरों में बांट दिया गया—बेसिक गणित (Basic Mathematics) और स्टैंडर्ड गणित (Standard Mathematics)

नीति का तर्क:
तर्क यह दिया गया कि जो छात्र भविष्य में कला या वाणिज्य (Arts/Commerce) विषय लेना चाहते हैं, वे 10वीं में ‘बेसिक गणित’ चुन सकते हैं, जिसका पेपर आसान होगा।

वास्तविक नुकसान:
सुनने में यह नीति छात्र-हितैषी लगती है, लेकिन इसने ग्रामीण और सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को पंगु बना दिया है। स्कूल प्रबंधन और शिक्षक अपना रिजल्ट सुधारने के लिए अधिकांश छात्रों (विशेषकर कमजोर और औसत छात्रों) पर ‘बेसिक’ विकल्प चुनने का दबाव बनाते हैं। इससे छात्र 10वीं कक्षा में ही मानसिक रूप से यह मान लेता है कि वह कठिन पढ़ाई करने के योग्य नहीं है। यह प्रणाली छात्रों को उनके कंफर्ट जोन से बाहर निकालकर चुनौतियों का सामना करने (Problem Solving) की क्षमता विकसित करने से रोकती है। शिक्षा का काम मानसिक सीमाओं का विस्तार करना है, न कि उन्हें सिकोड़ना।

4. सप्लीमेंट्री से ‘द्वितीय मुख्य परीक्षा’ तक: अनुशासनहीनता का खुला खेल

परीक्षा का अर्थ होता है—परीक्षण और मूल्यांकन। लेकिन मध्य प्रदेश की वर्तमान व्यवस्था ने परीक्षा के भय और उसके सम्मान दोनों को खत्म कर दिया है। पहले पूरक (Supplementary) परीक्षा उन छात्रों के लिए एक कड़ा अवसर होती थी जो एक या दो विषय में चूक जाते थे। लेकिन अब ‘रुक जाना नहीं’ जैसी योजनाओं और सप्लीमेंट्री को ‘द्वितीय मुख्य परीक्षा’ (Second Exam) का रूप दे दिया गया है।

परीक्षा व्यवस्था का मजाक:
अब व्यवस्था यह हो गई है कि कोई भी छात्र मुख्य परीक्षा में कितने भी विषयों में फेल हो जाए, वह बिना किसी रुकावट के दूसरी परीक्षा में सभी विषयों के लिए बैठ सकता है। सबसे गंभीर बात यह है कि इन द्वितीय परीक्षाओं या ओपन परीक्षाओं में कोई उचित सुरक्षा व्यवस्था (Proper Security), मॉनिटरिंग या कड़ाई नहीं होती। न तो फ्लाइंग स्क्वाड का डर होता है और न ही चेकिंग की कोई सख्त व्यवस्था।

जब छात्रों को पता होता है कि वे मुख्य परीक्षा में फेल होने के बाद भी एक ढीली और सुस्त व्यवस्था वाली ‘दूसरी परीक्षा’ में आसानी से पास हो जाएंगे, तो वे साल भर मेहनत क्यों करेंगे? यह नीति ‘असफलता को पुरस्कृत करने’ (Rewarding Failure) जैसी हो गई है। यह छात्रों के भीतर से प्रतिस्पर्धा, अनुशासन और कड़ी मेहनत की भावना को खत्म कर रही है।

निष्कर्ष: यह ‘पेपर लीक’ नहीं, पूरा ‘परीक्षा लीक’ है

जब हम इन चारों बिंदुओं को एक साथ जोड़कर देखते हैं, तो एक भयावह तस्वीर उभरती है।

  1. कक्षा 8 तक बिना परीक्षा दिए पास होना।
  2. 10वीं में गणित या अंग्रेजी जैसे कठिन विषयों को ‘बेस्ट ऑफ फाइव’ के जरिए छोड़ देना।
  3. अगर पढ़ना ही पड़े तो ‘बेसिक’ विषय चुनकर सरलता का रास्ता अपनाना।
  4. और अगर फिर भी फेल हो जाएं, तो बिना किसी कड़ाई वाली ‘दूसरी परीक्षा’ देकर पास हो जाना।

An Institutional Exam Leak Not Only Paper Leak एक ऐसी फुल-प्रूफ प्रणाली बन गई है जिसका एकमात्र उद्देश्य छात्रों को किसी भी तरह से पास करना और कागजी डिग्रियों का अंबार लगाना है। यही कारण है कि आज प्रदेश में लाखों युवा डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं, लेकिन जब वे रोजगार के लिए जाते हैं तो किसी भी काम के योग्य नहीं पाए जाते। इसे ही “पढ़ा-लिखा अनपढ़” होना कहते हैं।

हम अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NEET, पटवारी आदि) में होने वाले ‘पेपर लीक’ पर हंगामा करते हैं। लेकिन वह तो भ्रष्टाचार का केवल एक दृश्य रूप है। असली और सबसे खतरनाक लीकेज तो यह ‘परीक्षा लीक’ है, जहां सरकार की नीतियों ने ही पूरी मूल्यांकन प्रणाली को लीक कर दिया है, उसे महत्वहीन बना दिया है।

यदि भारत को वास्तव में विश्वगुरु बनना है और अपने डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का लाभ उठाना है, तो उसे आंकड़ों की बाजीगरी छोड़कर शिक्षा की गुणवत्ता और परीक्षाओं की पवित्रता पर लौटना ही होगा। छात्रों को चुनौतियों से बचाने के बजाय उन्हें चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना होगा, क्योंकि मार्कशीट बांटने से साक्षरता दर तो बढ़ सकती है, लेकिन एक सशक्त और शिक्षित राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता।

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