E Attendance Madhya Pradesh Teachers : मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के लिए सरकार द्वारा ‘ई-अटेंडेंस’ (m-Shiksha Mitra या उससे संबद्ध व्यवस्था) को अनिवार्य किया गया है। एक शिक्षाविद (Educationalist) के रूप में, हमारा उद्देश्य तकनीकी प्रगति का विरोध करना नहीं है। शिक्षक भी तकनीकी रूप से अनुशासित होने और ई-अटेंडेंस देने का विरोध नहीं कर रहे हैं। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब इस पूरी व्यवस्था की डिजिटल सुरक्षा, ऐप के विकास (Development) के तरीकों और सार्वजनिक दावों के बीच गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। क्या हम एक संवेदनशील सरकारी प्रणाली और शिक्षकों के व्यक्तिगत डेटा को लेकर किसी ऐप पर आँख मूँदकर भरोसा (Blind Belief) कर सकते हैं? आइए इसके पीछे के तथ्यों और प्रमाणों का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं।
1. डेवलपर की प्रामाणिकता और तकनीकी विरोधाभास
गूगल प्ले स्टोर (Google Play Store) पर उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस ऐप के डेवलपर क्रेडेंशियल्स इस प्रकार हैं:
- डेवलपर का नाम: राजीव गांधी शिक्षा मिशन (Rajeev Gandhi Shiksha Mission / RSK)
- ईमेल: vaibhavrsk@gmail.com
- पता: B-Wing, पुस्तक भवन, अरेरा हिल्स, भोपाल, मध्य प्रदेश – 462011
- संपर्क: +91 94251 37773
यहाँ क्या सवाल उठता है?
राजीव गांधी शिक्षा मिशन (अब राज्य शिक्षा केंद्र – RSK) मध्य प्रदेश शासन का एक प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थान है, जिसका मुख्य काम नीतियों का क्रियान्वयन, पाठ्यपुस्तकों का निर्माण और प्राथमिक/माध्यमिक शिक्षा का संचालन करना है। यह कोई पेशेवर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट फर्म या आईटी कंपनी नहीं है।
प्ले स्टोर पर आधिकारिक ईमेल आईडी के रूप में एक व्यक्तिगत जीमेल (vaibhavrsk@gmail.com) का होना और आधिकारिक सरकारी डोमेन (जैसे @mp.gov.in या @nic.in) का न होना, डिजिटल सुरक्षा के पैमानों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। एक सरकारी संस्थान, जिसके पास इन-हाउस सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की कोई बड़ी फौज नहीं होती, वह खुद इतने बड़े स्तर का ऐप कैसे विकसित कर सकता है?
2. रैपर ऐप्स (Wrapper Apps) और थर्ड-पार्टी कंपनियों का खेल
जैसा कि इस ऐप के तकनीकी ढांचे (Package Name: co.median.android...) से प्रमाणित होता है, यह ऐप किसी कोर कोडिंग (Java/Kotlin) से बना नेटिव ऐप नहीं है। यह Median.co (पुराना नाम GoNative.io) जैसे विदेशी नो-कोड/लो-कोड प्लेटफॉर्म का उपयोग करके बनाया गया एक रैपर ऐप (Wrapper App) है।
इसका सीधा सा मतलब है कि विभाग की जो वेबसाइट या वेब-पोर्टल बैकएंड में काम कर रहा है, उसे सिर्फ एक ‘ऐप के खोल’ (App Shell) में लपेटकर प्ले स्टोर पर डाल दिया गया है।
प्राइवेसी और सुरक्षा का असली जोखिम
जब सरकारी संस्थान खुद कोडिंग करने के बजाय Median.co जैसे वैश्विक टूल्स का उपयोग करते हैं, तो ऐप का मूल ढांचा उस विदेशी प्लेटफॉर्म द्वारा तैयार किया जाता है।
- वैश्विक कार्यबल (Global Workforce): इन अंतरराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म्स (SaaS) में दुनिया भर के डेवलपर्स और इंजीनियर काम करते हैं, जिनमें भारत के पड़ोसी देशों (जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश या पूर्वी यूरोप) के इंजीनियर भी शामिल हो सकते हैं। जब एक सरकारी विभाग बिना किसी कड़े सिक्योरिटी ऑडिट के ऐसे टूल्स का उपयोग करता है, तो अनजाने में संवेदनशील प्रणालियों का एक्सेस या उनके बुनियादी ढांचे की जानकारी वैश्विक स्तर पर साझा होने का जोखिम बढ़ जाता है।
- डेटा सुरक्षा और परमिशन: चूंकि यह ऐप शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए फोन की लाइव लोकेशन (GPS), कैमरा (बायोमेट्रिक या फोटो के लिए) और स्टोरेज का एक्सेस मांगता है, इसलिए एक साधारण थर्ड-पार्टी रैपर ऐप के जरिए इतने संवेदनशील डेटा का फ्लो होना चिंताजनक है।
3. एक शिक्षाविद के रूप में हमारे तीन मुख्य सवाल
तकनीक का स्वागत है, लेकिन सुरक्षा की कीमत पर नहीं। सरकार और संबंधित विभाग को इन तीन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण देना चाहिए:
- आधिकारिक डोमेन का अभाव क्यों? प्ले स्टोर पर किसी एक अधिकारी या कर्मचारी की व्यक्तिगत क्रेडेंशियल्स और जीमेल आईडी के बजाय एनआईसी (NIC) या एमपी ऑनलाइन के आधिकारिक सुरक्षित सर्वर और ईमेल का उपयोग क्यों नहीं किया गया?
- सिक्योरिटी ऑडिट प्रमाण पत्र कहाँ है? क्या इस रैपर ऐप का CERT-In (Cyber Emergency Response Team of India) या किसी अधिकृत सरकारी एजेंसी द्वारा उचित प्राइवेसी और सुरक्षा ऑडिट (Security Audit) कराया गया है?
- आउटसोर्सिंग में पारदर्शिता: यदि राजीव गांधी शिक्षा मिशन ने इस ऐप के बैकएंड या कनवर्टर टूल को आउटसोर्स किया है, तो डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए क्या नियम और शर्तें तय की गई हैं?
निष्कर्ष
शिक्षकों का ई-अटेंडेंस का विरोध न करना उनकी कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है। लेकिन एक सजग समाज और शिक्षाविदों के नाते, हमारा यह दायित्व है कि हम डिजिटल सुरक्षा के प्रति सरकार को सचेत करें। बिना किसी प्रामाणिक तकनीकी ऑडिट और आधिकारिक सरकारी क्रेडेंशियल्स के, किसी भी थर्ड-पार्टी आधारित ऐप पर आँख मूँदकर भरोसा करना हमारे राज्य के हज़ारों शिक्षकों के व्यक्तिगत डेटा और शासकीय डेटा सुरक्षा (Cyber Security) के साथ एक बड़ा समझौता हो सकता है। विभाग को तुरंत इसमें सुधार कर एक पूर्णतः सुरक्षित, स्वदेशी और प्रमाणित नेटिव सरकारी एप्लिकेशन पेश करना चाहिए।